

सफर “ट्रेन” का
यात्रा ट्रेन की
हजारों की भीड़
किसी की गंतव्य यात्रा
किसी की लौट आने की यात्रा
कोई अपनों से दूर
अजनबियों के बीच जाता हुआ
और
कोई अजनबियों से होकर
अपनों के बीच पहुंचता हुआ
इस यात्रा से चिढ़ होने से लेकर
इस यात्रा की आदत पड़ने तक
यहां तक आने में
ना जाने कितने त्योहार गवाह हैं
ना जाने कितनी उदासियां सबूत है
वो घर जाने की एक अलग सी मिलने वाली खुशी
अपने घराने का सुकून
और
फिर, इस सुकून को जस का तस छोड़कर
ना चाहते हुए भी
उन लोगों के बीच वापस जाना
जो आपको रत्ती भर भी पसंद नहीं
लेकिन
अंततः यही जीवन है
यही जीवन की यात्रा है
आप ना चाहते हुए भी
कुछ लोगों को झेलते हैं
आप ना चाहते हुए भी
इस भीड़ का हिस्सा बनते हैं
और
ये सफर,
तय करते करते
जीवन का सफर भी
अपने पड़ाव पर पहुंच रहा….!!!