
“पसंद”
क्या है ये?
किसी चीज का पसंद आना
किसी जगह का पसंद आ जाना
किसी व्यक्ति का बस पसंद आ जाना
ना दिमागी रूप से इस पसंद में
आपकी सहमति होती
ना ही दिली तौर पर इस पसंद में
आपकी इजाजत होती
लेकिन दिमाग और दिल की
कितनी ही दफा बन पाई है
दिमाग जिस स्थिति की सच्चाई से
रूबरू होता
ये दिल उन्हीं खयालों के लिए
सौ बहाने तैयार कर लेता
और कभी कभी ये सोचना
कोई व्यक्ति
आपके स्वभाव के एकदम विपरीत
आपके मन में बनाए गए भाव के
एकदम विपरीत
ऐसा कोई आपको
पसंद कैसे आ सकता?
ऐसा कोई
जिनको आप अपने से एकदम
उलट पाते हो
अगर आप चुप रहते
वो एक भी पल ना चुप रहने वाले
अगर आप ज्यादा सोचते
वो हर लम्हे को बेफिक्री में जीने वाले
आप भविष्य के खयालों में
आज को भूलने वाले
और वो
इस एक लम्हे को पूरी तरह जीने वाले
बिलकुल विपरीत
सूरत सीरत और सोच
लेकिन दिल का क्या है
इसने आपने सलाह लेकर
कहां कभी कुछ किया है
और सबसे जरूरी बात
जब इस “पसंद” करने के प्रक्रिया में
आप अकेले शामिल हो
सामने वाला इंसान नही
फिर वर्तमान में
इस व्यथा का निवारण
असंभव सा लगता ….!!!!










