
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए?
जिंदगी के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए
कुछ कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो—
इसी पर जो भाव जी में उठे वह कहा कैसे जाए!
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए?