
बचपन और मेले
हमेशा से एक दूसरे के
समप्रत्यय प्रतीत होते हैं
वो चेहरे की चमक
जगमग रोशनी को भी
फीकी सी कर देती है
वो पसंद के गुब्बारे मिलने पर
खुलके चहचहा उठना
तरह तरह की मिठाइयां देखकर
उन्हें अपनी दुनिया की मिठास समझ लेना
जैसे जन्नत उन्ही में बसती हो
ये मिठास बाद में बहुत याद आती है
जब जीवन प्रतिदिन एक नई
कड़वी सच्चाई से रूबरू होता है
ये चेहरे की चमक
बाद में आंखे नम कर जाती हैं
जब जीवन प्रतिदिन एक नई
कठिनाई से रुबरू होता है
वो मेले में खोने के डर से
वो किसी का हाथ थामकर चलना
बाद में कब हम दुनिया की इस भीड़ में
खो से जाते
कि नजर आकर भी
किसी को नजर नहीं आते
घर से मेले में जाने की जिद करना
और उसी मेले का बहाना लेकर
अब कुछ दिनों के लिए घर वापस आना
जिंदगी अलग सी हो गई
जिंदगी कठिन सी हो गई
पहले खुश होने के लिए
मुस्कुराया करते थे
और अब तस्वीरों में पूर्ण दिखने के लिए
मुस्कुरा कर दिखाया करते हैं